जयपुर अंतरराष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन में विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी को आमंत्रित करने के बाद देश भर में मुस्लिम कट्टरपंथियों को एकजुट करने और फिर सम्मेलन से कुछ समय पहले आतंकी खतरे को आधार बनाकर राजस्थान की गहलोत सरकार ने अपनी पार्टी कांग्रेस की नीति को सरकार व प्रशासन पर हावी करने का जो सियासत भरा काम किया है वह इस देश में मुस्लिम कटट्टरपंथ के दबाव को किस हद तक ले जाएगा इसका अंदाजा शायद न तो केंद्र की मौजूदा कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को है और न ही राजस्थान की कांग्रेस सरकार को। ऐसे ही तुष्टिकरण की नीति आजादी से पहले अपनाते हुए कांग्रेस ने देश को विभाजन की आंच में झोंक दिया था। और आज देश को फिर से एक विभाजन के कगार पर खड़ा कर दिया है और यह विभाजन उससे भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यह एक भाई को दूसरे भाई से लड़ाने की कुटिल चाल का हिस्सा है जिसके एक बार शुरू हो जाने के बाद सबसे भयावह और पीढ़ियों तक अनवरत चलते रहने वाली प्रक्रिया चलती रहती है। और शायद इसी को ध्यान में रखते हुए रहीम का यह दोहा रचा गया था-
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे पै फिर ना जुड़ै, जुड़े गांठ परि जाय।।
कट्टरपंथ और उदारपंथ के बीच की लकीर को मिटाने के लिहाज से खेली जाने वाली राजनीति का यह खेल देश को तालिबानी मानसिकता की ओर ले जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। सलमान रुश्दी को साहित्य उत्सव में आने से रोकने के लिए रची गई राजस्थान सरकार और स्थानीय पुलिस प्रशासन की भूमिका से जाहिर है कि एक सोची-समझी रणनीति अपनाई गई थी और अंतत: वीडियो लिंक से भी रुश्दी के संबोधन को रोकने के लिए महज कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों के विरोध की आड़ ली गई। इस पूरे षडयंत्र के पीछे किसकी कुटिल मंशा काम कर रही थी, यह अब जांच का विषय बन गई है। अगर देश में चुनावी मौसम को लेकर मामले को तूल दिया जा रहा है और कट्टरपंथी मुस्लिमों के तुष्टिकरण का प्रयास हो रहा है तो यह निश्चित तौर पर गंभीर चिंता का विषय है। सैटेनिक वर्सेस के लेखन के बाद से विवाद में रहे सलमान रुश्दी कई बार भारत आ चुके हैं और चार साल पहले उन्होंने जयपुर में ही साहित्य सम्मेलन में शिरकत भी की। तो फिर इस बार उन्हें भारत आने से रोकने के लिए इतना हो-हल्ला क्यों मचाया गया? इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि रुश्दी को किन सबूतों के आधार पर यह कहा गया कि यहां उनके जीवन को अंडरवर्ल्ड से खतरा है। और अगर देश में किसी को अंडरवर्ल्ड से खतरा होगा तो क्या सरकार उसे देश से बाहर भेज देगी या सुरक्षा मुहैया कराएगी? सुरक्षा संबंधी यदि गलत जानकारी दी गई तो उस पुलिस तंत्र को कठघरे में क्यों नहीं खड़ा किया जाना चाहिए? सलमान रुश्दी ने भी जिन वजहों की आड़ ली और जिस तरह अपना भारत दौरा रद्द कर दिया उससे भी सवाल पैदा होता है कि वे इस विवाद से लाभ लेने की फिराक में तो नहीं थे? आखिर उन्हें भारतीय राजनीति का मोहरा बनने की क्या जरूरत थी? असल में तो यह मुद्दा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने के अधिकार से ज्यादा जुड़ा है। क्या हमें किसी खास नजरिये को मानने को बाध्य किया जाएगा? कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोगों को सोचना होगा कि वे देश को किस ओर ले जा रहे हैं और ऐसी हरकतों को अंजाम देकर क्या संदेश देना चाहते हैं। क्या मतभिन्नता रखना इस देश में गुनाह है? रुश्दी के सामने भी विरोध प्रदर्शन की अनुमति दी जा सकती थी लेकिन इस पूरे मुद्दे पर सिर्फ और सिर्फ राजनीति की गयी है। एक साहित्य सम्मेलन को राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया जो बिलकुल अनुचित है और इसमें केंद्र तथा राज्य सरकार व स्थानीय प्रशासन की हास्यास्पद भूमिका सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी पर ही नहीं बल्कि दुनिया में बनी हमारी साख पर भी हमला है और ऐसे किसी हमले से बचने की सख्त जरूरत है। लोकतंत्र और भीड़तंत्र में सिर्फ यही अंतर होता है कि भीड़ का कोई दर्शन नहीं होता। कुल मिलाकर सत्ता में रहते हुए राजनीतिक दल यदि वोटों के ध्रुवीकरण की कुटिल मुहिम में संलग्न रहते हैं तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित होनेवाला है। राजस्थान सरकार ने जिस तरह विरोध को लेकर बावेला मचाया है इससे साफ है कि पुलिस प्रशासन राजनीतिक आकाओं से हैंडल हो रहा था और उसका रोल संदेह के घेरे में है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां किसी भी मसले को तिल का ताड़ बनाने वालों की न कोई कमी है अपितु उसके पीछे आंख मूंदकर समर्थन करने वालों की भी होड़ सी लग जाती है। और शायद एक वजह यह भी है कि किसी ऐसे तुच्छ मसले को भी राजनीति का मोहरा बनाने की परिपाटी चल पड़ती है और राजनीतिक दल अपने-अपने नजरिये से शासन-प्रशासन का दुरुपयोग करने के षडयंत्र में शामिल हो जाते है। कुल मिलाकर इस मामले में अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित करने का प्रयास हुआ है और यह निश्चय ही चिंता उत्पन्न करने वाला विषय है।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment