Wednesday, January 25, 2012
विवादों से सियासी लाभ लेने के लिए सत्ता का दुरुपयोग
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे पै फिर ना जुड़ै, जुड़े गांठ परि जाय।।
कट्टरपंथ और उदारपंथ के बीच की लकीर को मिटाने के लिहाज से खेली जाने वाली राजनीति का यह खेल देश को तालिबानी मानसिकता की ओर ले जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। सलमान रुश्दी को साहित्य उत्सव में आने से रोकने के लिए रची गई राजस्थान सरकार और स्थानीय पुलिस प्रशासन की भूमिका से जाहिर है कि एक सोची-समझी रणनीति अपनाई गई थी और अंतत: वीडियो लिंक से भी रुश्दी के संबोधन को रोकने के लिए महज कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों के विरोध की आड़ ली गई। इस पूरे षडयंत्र के पीछे किसकी कुटिल मंशा काम कर रही थी, यह अब जांच का विषय बन गई है। अगर देश में चुनावी मौसम को लेकर मामले को तूल दिया जा रहा है और कट्टरपंथी मुस्लिमों के तुष्टिकरण का प्रयास हो रहा है तो यह निश्चित तौर पर गंभीर चिंता का विषय है। सैटेनिक वर्सेस के लेखन के बाद से विवाद में रहे सलमान रुश्दी कई बार भारत आ चुके हैं और चार साल पहले उन्होंने जयपुर में ही साहित्य सम्मेलन में शिरकत भी की। तो फिर इस बार उन्हें भारत आने से रोकने के लिए इतना हो-हल्ला क्यों मचाया गया? इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि रुश्दी को किन सबूतों के आधार पर यह कहा गया कि यहां उनके जीवन को अंडरवर्ल्ड से खतरा है। और अगर देश में किसी को अंडरवर्ल्ड से खतरा होगा तो क्या सरकार उसे देश से बाहर भेज देगी या सुरक्षा मुहैया कराएगी? सुरक्षा संबंधी यदि गलत जानकारी दी गई तो उस पुलिस तंत्र को कठघरे में क्यों नहीं खड़ा किया जाना चाहिए? सलमान रुश्दी ने भी जिन वजहों की आड़ ली और जिस तरह अपना भारत दौरा रद्द कर दिया उससे भी सवाल पैदा होता है कि वे इस विवाद से लाभ लेने की फिराक में तो नहीं थे? आखिर उन्हें भारतीय राजनीति का मोहरा बनने की क्या जरूरत थी? असल में तो यह मुद्दा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने के अधिकार से ज्यादा जुड़ा है। क्या हमें किसी खास नजरिये को मानने को बाध्य किया जाएगा? कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोगों को सोचना होगा कि वे देश को किस ओर ले जा रहे हैं और ऐसी हरकतों को अंजाम देकर क्या संदेश देना चाहते हैं। क्या मतभिन्नता रखना इस देश में गुनाह है? रुश्दी के सामने भी विरोध प्रदर्शन की अनुमति दी जा सकती थी लेकिन इस पूरे मुद्दे पर सिर्फ और सिर्फ राजनीति की गयी है। एक साहित्य सम्मेलन को राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया जो बिलकुल अनुचित है और इसमें केंद्र तथा राज्य सरकार व स्थानीय प्रशासन की हास्यास्पद भूमिका सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी पर ही नहीं बल्कि दुनिया में बनी हमारी साख पर भी हमला है और ऐसे किसी हमले से बचने की सख्त जरूरत है। लोकतंत्र और भीड़तंत्र में सिर्फ यही अंतर होता है कि भीड़ का कोई दर्शन नहीं होता। कुल मिलाकर सत्ता में रहते हुए राजनीतिक दल यदि वोटों के ध्रुवीकरण की कुटिल मुहिम में संलग्न रहते हैं तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित होनेवाला है। राजस्थान सरकार ने जिस तरह विरोध को लेकर बावेला मचाया है इससे साफ है कि पुलिस प्रशासन राजनीतिक आकाओं से हैंडल हो रहा था और उसका रोल संदेह के घेरे में है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां किसी भी मसले को तिल का ताड़ बनाने वालों की न कोई कमी है अपितु उसके पीछे आंख मूंदकर समर्थन करने वालों की भी होड़ सी लग जाती है। और शायद एक वजह यह भी है कि किसी ऐसे तुच्छ मसले को भी राजनीति का मोहरा बनाने की परिपाटी चल पड़ती है और राजनीतिक दल अपने-अपने नजरिये से शासन-प्रशासन का दुरुपयोग करने के षडयंत्र में शामिल हो जाते है। कुल मिलाकर इस मामले में अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित करने का प्रयास हुआ है और यह निश्चय ही चिंता उत्पन्न करने वाला विषय है।
Saturday, January 7, 2012
इतिहास बनाने का मौका चूक रही है सिविल सोसायटी
संसद में लोकपाल विधेयक लोकसभा से पारित होकर राज्य सभा में बहस के अधीन लटक गया। बीच बहस में ही देर रात्रि राज्यसभा विधेयक पर बगैर मतदान कराये विधेयक पर बहस के बीच अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर देने और उससे पहले ही टीम अण्णा द्वारा अपना आंदोलन समेट लेने की वजह से लोकपाल की लड़ाई का भविष्य अंधकारमय हो गया है। सरकार के फैसले ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लोकपाल की आशा लगाए देश के करोड़ों लोगों की आशाओं पर तो तुषारापात किया ही। पांच राज्यों की आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीति का मुद्दा बनाने जा रहे कई राजनीतिक दलों को भी इससे गहरा झटका लगा। केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने सियासी रणनीति के तहत लोकपाल विधेयक को त्रिशंकु की तरह लटका छोड़ दिया। इससे पहले साल 2011 के अप्रैल से ही देश की जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग के राष्टीय आंदोलन में शामिल रही है। अगस्त में संसद के मानसून सत्र में दस महीनों से अधिक से सरकार पर बन रहे जनदबाव के बाद भी लोकपाल विधेयक का जो मसौदा लोकसभा में पारित हुआ वह काफी कमजोर और निष्प्रभावी लोकपाल का गठन करने वाला है। लोकपाल को भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। लेकिन उसे अपना सचिव तक चुनने का हक नहीं दिया जा रहा है। लोकपाल की नियुक्ति को निष्पक्ष बनाने के प्रयास करने चाहिए लेकिन उसमें सरकारी पक्ष की अधिकता है। केंद्रीय जांच ब्यूरो को लोकपाल के अधीन लाना चाहिए था लेकिन उसकी अभीयोजन शाखा को लोकपाल के दायरे से बाहर रख दिया गया था। राज्यों में लोकायुक्त गठन की भावना अगस्त में संसद ने स्थायी समिति को भेजी थी लेकिन स्थायी समिति ने उसे अपने मसौदे में शामिल नहीं किया। बाद में सरकार ने संसद में पेश विधेयक में उसे शामिल कर लिया तो उसके तौर-तरीके पर विपक्ष समेत संप्रग सरकार के अहम सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस को ही घोर आपत्ति हो गई। निचली नौकरशाही को लोकपाल के दायरे में लाने की भावना भी संसद ने व्यक्त की थी लेकिन ग्रुप सी के कर्मचारियों को बचाने का सरकारी प्रयास किया जा रहा है। जहां भ्रष्टाचार पर चौतरफा हमला करने योग्य लोकपाल संस्था का गठन करना अपरिहार्य बनता जा रहा है वहीं सरकार ऐसे प्रयास करने के लिए जनता को जागरूक और आंदोलित करने वालों पर ही चौतरफा हमले करने में जुटी रही। ईमानदार प्रयास करने की जगह साम, दाम, दंड और भेद की नीति के जरिये आंदोलन को ही तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। जाहिर है सिविल सोसायटी की ओर से गैरराजनीतिक तौर पर लड़ी जा रही मजबूत लोकपाल के लिए लड़ाई को तोड़ने की भरसक कोशिश की जा रही है।
क्या हो आंदोलन का
रुख
ऐसे में टीम अण्णा ने मुंबई के मरदा मैदान से अण्णा हजारे के अनशन खत्म करते वक्त जो घोषणाएं की उन्हें अमल में लाने के प्रति दृढ़ता दिखाने की सख्त जरूरत है। भ्रष्टाचार के खिलाफ गैर राजनीतिक आंदोलन के तहत ही घोषित मतदाता जागरूकता अभीयान की जबरदस्त शुरुआत करनी चाहिए। इसे किसी भी हाल में स्थगित या रद्द नहीं किया जाना चाहिए। देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ मतदाताओं को जागरूक करने का यही सबसे सही वक्त है। साल 2012 की अंतिम छमाही में गुजरात और कुछ अन्य प्रांतों में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जाहिर है ऐसे अभीयानों के लिए इससे उपयुक्त और प्रासंगिक अवसर और कोई नहीं हो सकता। इसलिए टीम अण्णा को भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार तरीके से जनजागरूकता चलानी चाहिए। जहां तक संभ व हो आम मतदाताओं को यह समझाने का प्रयास करें कि भ्रष्टाचार किस तरह देश को विनाश की ओर ले जा रहा है। देश के प्रधानमंत्री और राष्टपति बार-बार अपने संबोधनों में भ्रष्टाचार को कैंसर की संज्ञा दे रहे हैं। भ्रष्टाचार आज देश की व्यवस्था के नस-नस में समाया हुआ है। यानि सरकार को व्यवस्था का प्रक्षालन करने वाला मजबूत तंत्र विकसित और खड़ा करना होगा। बिना इसकी परवाह किये कि कौन सा तंत्र पहले से है और कौन सा नया। क्या लोकपाल को इसलिए खारिज किया जा सकेगा कि तुम तो अभी बच्चे हो, पहले चलना तो सीखो। जाहिर है इसका उत्तर होगा- नहीं।सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि आंदोलन में भीड़ इकट्ठा करना ही एकमात्र मकसद नहीं बने बल्कि यह ध्यान रखना ज्यादा जरूरी है कि उसमें कौन-कौन से लोग आ रहे हैं। एक-एक महत्वपूर्ण व्यक्ति के पीछे हजारों लाखों लोग खड़े हैं और इसलिए वैसे व्यक्तियों का आह्वान करना ज्यादा अहम हो सकता है। आंदोलनकारियों को भीड़ को देखकर प्रफुल्लित या हतोत्साहित होना अच्छी बात नहीं है। देशहित में भ्रष्टाचार की जड़ों पर प्रहार करने का वक्त आ गया है। भ्रष्टाचार की गंगोत्री बनी राजनीति को स्वच्छ और निर्मल करना अहम हो गया है। तमाम सवाल उठाए जाने चाहिएं। भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहनशीलता की बात उठाई जाती है। लेकिन राजनीतिक पार्टियां खुद ही पारदर्शिता कायम रखने और भ्रष्टाचार के आरोपों में शामिल लोगों को सिरे से नकारने से परहेज क्यों कर रही है? आखिर टीम अण्णा यह बात क्यों भूल रही है कि उत्तर प्रदेश हमेशा से देश में ‘किंगमेकर’ राज्य के तौर पर जाना जाता है। केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। और इसके साथ पंजाब, असम, मणिपुर और गोवा में भी तो विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। क्या दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों और देश के कुछ शहरों मात्र में आंदोलन को केंद्रित रखकर भ्रष्टाचार को मिटाये जाने का स्वप्न देखा जा रहा है? क्या सिर्फ कानून बना देने से किसी समस्या का हल संभव हुआ है? कानूनों के होते हुए भी देश, समाज में कई विसगतियां कायम रहती हैं जब तक कि उनके खिलाफ लोगों को सचेत-जागरूक नहीं किया जाता। वास्तव में आंदोलन को देश के जन-जन तक पहुंचाना होगा। हरेक गांव और शहर में आंदोलन खड़ा करने का लक्ष्य लेकर चलना होगा, तभी अभीष्ट की यथेष्ट प्राप्ति संभव है। इस बात को गांठ बांधकर चलना होगा कि ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही मकसद नहीं, ये सूरत बदलनी चाहिए।’
Tuesday, January 3, 2012
सोशल मीडिया के खतरे
इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइट्स देश-विदेश में क्या सबकुछ ठीक चल रहा है? क्या किसी देश की सरकार को इनपर उंगली उठाने का अधिकार नहीं है? क्या ये अपराध करने, आतंकवाद को बढ़ावा देने, मानहानि करने, अफवाह फैलाने, सरकारों पर अनुचित दबाव बनाने, ब्लैकमेलिंग और जालसाजी के धंधे को बढ़ावा देने, कला के नाम पर किसी जाति, धर्म, समुदाय के लोगों और उनकी परंपराओं का मजाक उड़ाने और उन्हें भड़काने के अमूर्त और अप्रत्यक्ष अड्डे के तौर पर इस्तेमाल नहीं किए जा रहे हैं? अगर हां, तो वैसे तत्वों को चिन्हित करने, रोकने और दंडित करने के लिए आखिर किसकी जिम्मेदारी होगी। भारत में सरकार ने इस पर एक बहस को जन्म दे दिया है और यह इन साइटों पर सयता और शुचिता कायम करने के लिहाज से काफी सकारात्मक दृष्ठि से देखा जाना चाहिए। सवाल उठने लगे हैं और इनपर उन दिग्गजों को भी विचार करने की जरूरत है जो ट्विटर और फेसबुक के माध्यम से देश-विदेश में अपने लाखों-हजारों फॉलोअर्स से जुड़े रहते हैं। क्या सोशल मीडिया के नाम पर चलाए जा रहे इन साइट्स की कोई आचार संहिता नहीं होनी चाहिए। इनपर त्वरित अमल का प्रभावी तंत्र और प्रणाली (टूल्स और तकनीक के जरिये ही सही) उपलब्ध रहने के साथ-साथ प्रभावी भी होना चाहिए।
बढ़ते खतरों और सुझावों की झांकी :-
- लंदन के दंगों के दौरान दंगाइयों ने सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल प्रशासन के खिलाफ औजार के तौर पर किया।
- राजस्थान की एक पंचायत की वेबसाइट खोलने पर वहां अश्लील और बेहद आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट मिली।
- यूजर्स की व्यक्तिगत जानकारियों को बेचने का धंधा उजागर होता रहा है।
- बल्क एसएमएस के जरिये उग्रवादी विचारधारा को असीमित प्रचार-प्रसार मिलने का खतरा बना रहता है।
- आतंकवादी गतिविधियों के संचालन में भी सहायक है। अमेरिका के कब्जे में आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली के ई-मेल के जरिये कई सुराग हाथ लगे। स्पष्ट है आतंकी इन आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर अपनी राह आसान बनाते हैं। ऐसे में आवश्यक निगरानी और रोक के लिए हरसंभव त्वरित कार्रवाई की जरूरत है। न कि इसे शिकायतकर्ता द्वारा किसी कोर्ट या सरकार के पास जाने के लिए कहा जाय।
- फूहड़ टिप्पणियों को रचनात्मक नहीं कहा जा सकता।
- मनोरंजन के नाम पर किसी का उपहास उड़ाने की प्रवृत्ति को उकसावा मिलता है।
- कभी-कभी अहंकार के वशीभूत होकर भी कई टिप्पणियां दर्ज कर दी जाती है।
- इन साइट्स पर कौन किसकी जासूसी कर रहा है या कौन किसके खिलाफ षडयंत्र रचने में जुटा है, पता नहीं चल पाता?
- धर्म, नस्ल, जाति और सामाजिक प्रथाओं और रीति-रिवाजों पर व्यंग्यात्मक और घोर आपत्तिजनक टिप्पणियों से कितने ही लोगों को गलत तरह का उकसावा मिलता है।
- कंपनियों की सोच महज व्यावसायिक रहती है। वे एक प्लेटफार्म प्रदान करने का दिखावा करते हैं लेकिन उनका मूल मकसद कई तरह से लाभ हासिल करने का होता है, जिसे वे बखूबी छिपाए रखने में सफल रहते हैं।
- अपलिंकिंग के जैसे प्रावधान विदेशी मीडिया के लिए होते हैं वैसे ही सोशल मीडिया कंपनियों को भी उस देश में सर्वर स्थापित करने और वहां से नियंत्रण रखने और शिकायतों के निपटान की प्रणाली की व्यवस्था करने के लिए प्रावधान करना अनिवार्य करना चाहिए।
- खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों का एक बड़ा अमला इनकी निगरानी के लिए लगाना पड़ेगा, जो कोई भी सरकार आखिर ऐसा क्यों करे? कंपनियां खुद जिम्मेदारी नहीं लेंगी तो विसंगति होने पर मामला कोर्ट में जाने पर उसका जिम्मा कौन लेगा? क्या सोशल साइट्स पर भी पुलिस थाने और कोर्ट खोलने होंगे?
- शिकायतों के निपटान की प्रणाली त्वरित और व्यवस्थित नहीं है।
- लोग ईजी टू डू और ईजी टू स्पीक का फार्मूला अपनाकर किसी भी तरह की टिप्पणी कर बैठते हैं। गाहे-बगाहे जाने-अनजाने में वे कुछ ऐसा कह डालते हैं जो कि नैतिक नहीं माना जा सकता और वे ही इसे किसी प्रत्यक्ष मंच पर नहीं कह सकते।
- कई बार इन साइट्स पर किसी मसले पर मचे हो-हल्ले में मुद्दों की गंभीरता जाती रहती है।
- किसी बेबात की बात पर बहस छिड़ जाता है और लोग नक्कारखाने में तूती की तरह गाल बजाने में जुट जाते हैं।
- देश, समाज और अंतरराष्टीय मसलों पर राय जाहिर करते समय नियमों, संस्कृति, रीति-रिवाजों, आस्था और देशों की संप्रभुता का विचार ध्यान में रखे बगैर तस्वीरें, वीडियो और टिप्पणियां पोस्ट करने का चलन बढ़ता जा रहा है और इसे रोकने और वैसे लोगों को प्रतिबंधित करने तथा कानून के कठघरे में खड़ा करने की कोई व्यवस्था नहीं है।
- असंतोष को चौतरफा समर्थन के बाद वह कुंठा में बदल जाती है और फिर कुंठा में पड़ा व्यक्ति अपने प्रति कठोर कदम उठा बैठता है, जिसका खामियाजा उसे और उसके परिवारीजनों को भुगतना पड़ता है।
- अश्लील एमएमएस, वीडियो अपलोड करने और इस बहाने धमकी देकर ब्लैकमेलिंग के धंधा चलाने वाले भी इन साइटों पर मौजूद हैं, और उनपर कार्रवाई के लिए आखिर कौन देश-विदेश में कानूनी लड़ाइयां लड़ता रहेगा।
- कई के रिश्ते टूट रहे हैं, कई युवक-युवतियां आत्महत्या कर रहे हैं और कई मानसिक रूप से अस्वस्थ होने को अभिशप्त हैं। इन सब के पीछे वजह एक ही रही है और वह है सोशल मीडिया के प्रति उनकी दीवानगी। तनाव का वाहक बन रही है।
- कंपनियां तो कंप्यूटर और अन्य उपकरण बेचने के धंधे के चलते इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइटस का प्रचार करती हैं, लेकिन इसके मायाजाल में फंसकर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का अमूल्य समय व्यर्थ की माथापच्ची में गुजर जा रहा है।
सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से उभरे एक समाज में जिस कदर अफवाहें (ररयूमर्स) फैलाने के कई मामले सामने आए हैं इसने काफी संख्या में लोगों को हताश और परेशान भी किया है। ऐसी गतिविधियां यदि हमारे समाज में की जाती हैं तो उन्हें असामाजिक तत्वों में शामिल किया जाता है तो सोशल साइट्स पर ये सामाजिक कैसे कही जा सकती हैं। इनसे तो कोई इनकार नहीं कर सकता है कि सोशल साइट्स की उन्मुक्त दुनिया में मानहानिपरक टिप्पणियों और लोगों की छवि और निष्ठा के प्रति उलूल-जलूल आरोप लगाते हुए कमेंट्स, कार्टून्स, तस्वीरें और वीडियो देश-विदेश के किसी भी हिस्से से काफी संख्या में पोस्ट किए जा रहे हैं, जो उनकी व्यक्तिगत सोच के लिहाज से भी आपत्तिजनक ही होगी। जाहिर है इन अव्यवस्थाओं और कुव्यवस्थाओं से निपटने के लिए इन्टरनेट और सामाजिक नेटवर्किंग मीडिया को भी सतर्क और चौकन्ना रहना होगा और शिकायतों पर गंभीर होना ।