Tuesday, January 3, 2012

सोशल मीडिया के खतरे


इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइट्स देश-विदेश में क्या सबकुछ ठीक चल रहा है? क्या किसी देश की सरकार को इनपर उंगली उठाने का अधिकार नहीं है? क्या ये अपराध करने, आतंकवाद को बढ़ावा देने, मानहानि करने, अफवाह फैलाने, सरकारों पर अनुचित दबाव बनाने, ब्लैकमेलिंग और जालसाजी के धंधे को बढ़ावा देने, कला के नाम पर किसी जाति, धर्म, समुदाय के लोगों और उनकी परंपराओं का मजाक उड़ाने और उन्हें भड़काने के अमूर्त और अप्रत्यक्ष अड्डे के तौर पर इस्तेमाल नहीं किए जा रहे हैं? अगर हां, तो वैसे तत्वों को चिन्हित करने, रोकने और दंडित करने के लिए आखिर किसकी जिम्मेदारी होगी। भारत में सरकार ने इस पर एक बहस को जन्म दे दिया है और यह इन साइटों पर सयता और शुचिता कायम करने के लिहाज से काफी सकारात्मक दृष्ठि से देखा जाना चाहिए। सवाल उठने लगे हैं और इनपर उन दिग्गजों को भी विचार करने की जरूरत है जो ट्विटर और फेसबुक के माध्यम से देश-विदेश में अपने लाखों-हजारों फॉलोअर्स से जुड़े रहते हैं। क्या सोशल मीडिया के नाम पर चलाए जा रहे इन साइट्स की कोई आचार संहिता नहीं होनी चाहिए। इनपर त्वरित अमल का प्रभावी तंत्र और प्रणाली (टूल्स और तकनीक के जरिये ही सही) उपलब्ध रहने के साथ-साथ प्रभावी भी होना चाहिए।



बढ़ते खतरों और सुझावों की झांकी :-



  • लंदन के दंगों के दौरान दंगाइयों ने सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल प्रशासन के खिलाफ औजार के तौर पर किया।

  • राजस्थान की एक पंचायत की वेबसाइट खोलने पर वहां अश्लील और बेहद आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट मिली।

  • यूजर्स की व्यक्तिगत जानकारियों को बेचने का धंधा उजागर होता रहा है।

  • बल्क एसएमएस के जरिये उग्रवादी विचारधारा को असीमित प्रचार-प्रसार मिलने का खतरा बना रहता है।

  • आतंकवादी गतिविधियों के संचालन में भी सहायक है। अमेरिका के कब्जे में आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली के ई-मेल के जरिये कई सुराग हाथ लगे। स्पष्ट है आतंकी इन आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर अपनी राह आसान बनाते हैं। ऐसे में आवश्यक निगरानी और रोक के लिए हरसंभव त्वरित कार्रवाई की जरूरत है। न कि इसे शिकायतकर्ता द्वारा किसी कोर्ट या सरकार के पास जाने के लिए कहा जाय।

  • फूहड़ टिप्पणियों को रचनात्मक नहीं कहा जा सकता।

  • मनोरंजन के नाम पर किसी का उपहास उड़ाने की प्रवृत्ति को उकसावा मिलता है।

  • कभी-कभी अहंकार के वशीभूत होकर भी कई टिप्पणियां दर्ज कर दी जाती है।

  • इन साइट्स पर कौन किसकी जासूसी कर रहा है या कौन किसके खिलाफ षडयंत्र रचने में जुटा है, पता नहीं चल पाता?

  • धर्म, नस्ल, जाति और सामाजिक प्रथाओं और रीति-रिवाजों पर व्यंग्यात्मक और घोर आपत्तिजनक टिप्पणियों से कितने ही लोगों को गलत तरह का उकसावा मिलता है।

  • कंपनियों की सोच महज व्यावसायिक रहती है। वे एक प्लेटफार्म प्रदान करने का दिखावा करते हैं लेकिन उनका मूल मकसद कई तरह से लाभ हासिल करने का होता है, जिसे वे बखूबी छिपाए रखने में सफल रहते हैं।

  • अपलिंकिंग के जैसे प्रावधान विदेशी मीडिया के लिए होते हैं वैसे ही सोशल मीडिया कंपनियों को भी उस देश में सर्वर स्थापित करने और वहां से नियंत्रण रखने और शिकायतों के निपटान की प्रणाली की व्यवस्था करने के लिए प्रावधान करना अनिवार्य करना चाहिए।

  • खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों का एक बड़ा अमला इनकी निगरानी के लिए लगाना पड़ेगा, जो कोई भी सरकार आखिर ऐसा क्यों करे? कंपनियां खुद जिम्मेदारी नहीं लेंगी तो विसंगति होने पर मामला कोर्ट में जाने पर उसका जिम्मा कौन लेगा? क्या सोशल साइट्स पर भी पुलिस थाने और कोर्ट खोलने होंगे?

  • शिकायतों के निपटान की प्रणाली त्वरित और व्यवस्थित नहीं है।

  • लोग ईजी टू डू और ईजी टू स्पीक का फार्मूला अपनाकर किसी भी तरह की टिप्पणी कर बैठते हैं। गाहे-बगाहे जाने-अनजाने में वे कुछ ऐसा कह डालते हैं जो कि नैतिक नहीं माना जा सकता और वे ही इसे किसी प्रत्यक्ष मंच पर नहीं कह सकते।

  • कई बार इन साइट्स पर किसी मसले पर मचे हो-हल्ले में मुद्दों की गंभीरता जाती रहती है।

  • किसी बेबात की बात पर बहस छिड़ जाता है और लोग नक्कारखाने में तूती की तरह गाल बजाने में जुट जाते हैं।

  • देश, समाज और अंतरराष्टीय मसलों पर राय जाहिर करते समय नियमों, संस्कृति, रीति-रिवाजों, आस्था और देशों की संप्रभुता का विचार ध्यान में रखे बगैर तस्वीरें, वीडियो और टिप्पणियां पोस्ट करने का चलन बढ़ता जा रहा है और इसे रोकने और वैसे लोगों को प्रतिबंधित करने तथा कानून के कठघरे में खड़ा करने की कोई व्यवस्था नहीं है।

  • असंतोष को चौतरफा समर्थन के बाद वह कुंठा में बदल जाती है और फिर कुंठा में पड़ा व्यक्ति अपने प्रति कठोर कदम उठा बैठता है, जिसका खामियाजा उसे और उसके परिवारीजनों को भुगतना पड़ता है।

  • अश्लील एमएमएस, वीडियो अपलोड करने और इस बहाने धमकी देकर ब्लैकमेलिंग के धंधा चलाने वाले भी इन साइटों पर मौजूद हैं, और उनपर कार्रवाई के लिए आखिर कौन देश-विदेश में कानूनी लड़ाइयां लड़ता रहेगा।

  • कई के रिश्ते टूट रहे हैं, कई युवक-युवतियां आत्महत्या कर रहे हैं और कई मानसिक रूप से अस्वस्थ होने को अभिशप्त हैं। इन सब के पीछे वजह एक ही रही है और वह है सोशल मीडिया के प्रति उनकी दीवानगी। तनाव का वाहक बन रही है।

  • कंपनियां तो कंप्यूटर और अन्य उपकरण बेचने के धंधे के चलते इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइटस का प्रचार करती हैं, लेकिन इसके मायाजाल में फंसकर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का अमूल्य समय व्यर्थ की माथापच्ची में गुजर जा रहा है।


सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से उभरे एक समाज में जिस कदर अफवाहें (ररयूमर्स) फैलाने के कई मामले सामने आए हैं इसने काफी संख्या में लोगों को हताश और परेशान भी किया है। ऐसी गतिविधियां यदि हमारे समाज में की जाती हैं तो उन्हें असामाजिक तत्वों में शामिल किया जाता है तो सोशल साइट्स पर ये सामाजिक कैसे कही जा सकती हैं। इनसे तो कोई इनकार नहीं कर सकता है कि सोशल साइट्स की उन्मुक्त दुनिया में मानहानिपरक टिप्पणियों और लोगों की छवि और निष्ठा के प्रति उलूल-जलूल आरोप लगाते हुए कमेंट्स, कार्टून्स, तस्वीरें और वीडियो देश-विदेश के किसी भी हिस्से से काफी संख्या में पोस्ट किए जा रहे हैं, जो उनकी व्यक्तिगत सोच के लिहाज से भी आपत्तिजनक ही होगी। जाहिर है इन अव्यवस्थाओं और कुव्यवस्थाओं से निपटने के लिए इन्टरनेट और सामाजिक नेटवर्किंग मीडिया को भी सतर्क और चौकन्ना रहना होगा और शिकायतों पर गंभीर होना ।

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