भ्रष्टाचार के खिलाफ केंद्र में मजबूत लोकपाल और राज्यों में मजबूत लोकायुक्त के गठन के लिए सरकार पर दबाव देने में कारगर रहा समाजवेवी अण्णा हजारे के नेतृत्व में सिविल सोसायटी का आंदोलन जनमानस में बड़ी क्रांति का शंखनाद कर चुका है। आज इतिहास बनाने की दहलीज पर खड़े होकर भी टीम अण्णा अगर असमंजस के दौर से गुजर रही है तो जाहिर है इसके पीछे भी कुछ अदृश्य ठोस वजहें रही होंगी। पता नहीं किन कारणों की वजह से वह इस अवसर को अपने हाथ से जाने दे रही है। उसे अविलंब अपना रुख (स्टैंड) स्पष्ट करना चाहिए ताकि जनांदोलनों से प्रेरित हुए लोगों का हौसला डिगने न पाये। देश में एक बड़ा तबका वैसे लोगों का है जो इस आंदोलन को मौन समर्थन दे रहे हैं। और यह तबका उस अक्रिय गैस हीलियम की तरह है, जो कहने को तो अक्रिय (इनर्ट) है, लेकिन इसी के संलयन से बनते हाइड्रोजन से निकलती ऊर्जा बिखेरते हुए सूर्य करोड़ों वर्षों तक रोशनी फैलाने में सक्षम बने हुए हैं और रहेंगे। ऐसे लोगों का संकल्प बल काफी है। उनकी हुंकार के आगे शेर भी गीदड़ हैं और इसीलिए आज उन्हें जगाने का वक्त आ गया है।
संसद में लोकपाल विधेयक लोकसभा से पारित होकर राज्य सभा में बहस के अधीन लटक गया। बीच बहस में ही देर रात्रि राज्यसभा विधेयक पर बगैर मतदान कराये विधेयक पर बहस के बीच अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर देने और उससे पहले ही टीम अण्णा द्वारा अपना आंदोलन समेट लेने की वजह से लोकपाल की लड़ाई का भविष्य अंधकारमय हो गया है। सरकार के फैसले ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लोकपाल की आशा लगाए देश के करोड़ों लोगों की आशाओं पर तो तुषारापात किया ही। पांच राज्यों की आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीति का मुद्दा बनाने जा रहे कई राजनीतिक दलों को भी इससे गहरा झटका लगा। केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने सियासी रणनीति के तहत लोकपाल विधेयक को त्रिशंकु की तरह लटका छोड़ दिया। इससे पहले साल 2011 के अप्रैल से ही देश की जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग के राष्टीय आंदोलन में शामिल रही है। अगस्त में संसद के मानसून सत्र में दस महीनों से अधिक से सरकार पर बन रहे जनदबाव के बाद भी लोकपाल विधेयक का जो मसौदा लोकसभा में पारित हुआ वह काफी कमजोर और निष्प्रभावी लोकपाल का गठन करने वाला है। लोकपाल को भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। लेकिन उसे अपना सचिव तक चुनने का हक नहीं दिया जा रहा है। लोकपाल की नियुक्ति को निष्पक्ष बनाने के प्रयास करने चाहिए लेकिन उसमें सरकारी पक्ष की अधिकता है। केंद्रीय जांच ब्यूरो को लोकपाल के अधीन लाना चाहिए था लेकिन उसकी अभीयोजन शाखा को लोकपाल के दायरे से बाहर रख दिया गया था। राज्यों में लोकायुक्त गठन की भावना अगस्त में संसद ने स्थायी समिति को भेजी थी लेकिन स्थायी समिति ने उसे अपने मसौदे में शामिल नहीं किया। बाद में सरकार ने संसद में पेश विधेयक में उसे शामिल कर लिया तो उसके तौर-तरीके पर विपक्ष समेत संप्रग सरकार के अहम सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस को ही घोर आपत्ति हो गई। निचली नौकरशाही को लोकपाल के दायरे में लाने की भावना भी संसद ने व्यक्त की थी लेकिन ग्रुप सी के कर्मचारियों को बचाने का सरकारी प्रयास किया जा रहा है। जहां भ्रष्टाचार पर चौतरफा हमला करने योग्य लोकपाल संस्था का गठन करना अपरिहार्य बनता जा रहा है वहीं सरकार ऐसे प्रयास करने के लिए जनता को जागरूक और आंदोलित करने वालों पर ही चौतरफा हमले करने में जुटी रही। ईमानदार प्रयास करने की जगह साम, दाम, दंड और भेद की नीति के जरिये आंदोलन को ही तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। जाहिर है सिविल सोसायटी की ओर से गैरराजनीतिक तौर पर लड़ी जा रही मजबूत लोकपाल के लिए लड़ाई को तोड़ने की भरसक कोशिश की जा रही है।
क्या हो आंदोलन का
रुख
ऐसे में टीम अण्णा ने मुंबई के मरदा मैदान से अण्णा हजारे के अनशन खत्म करते वक्त जो घोषणाएं की उन्हें अमल में लाने के प्रति दृढ़ता दिखाने की सख्त जरूरत है। भ्रष्टाचार के खिलाफ गैर राजनीतिक आंदोलन के तहत ही घोषित मतदाता जागरूकता अभीयान की जबरदस्त शुरुआत करनी चाहिए। इसे किसी भी हाल में स्थगित या रद्द नहीं किया जाना चाहिए। देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ मतदाताओं को जागरूक करने का यही सबसे सही वक्त है। साल 2012 की अंतिम छमाही में गुजरात और कुछ अन्य प्रांतों में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जाहिर है ऐसे अभीयानों के लिए इससे उपयुक्त और प्रासंगिक अवसर और कोई नहीं हो सकता। इसलिए टीम अण्णा को भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार तरीके से जनजागरूकता चलानी चाहिए। जहां तक संभ व हो आम मतदाताओं को यह समझाने का प्रयास करें कि भ्रष्टाचार किस तरह देश को विनाश की ओर ले जा रहा है। देश के प्रधानमंत्री और राष्टपति बार-बार अपने संबोधनों में भ्रष्टाचार को कैंसर की संज्ञा दे रहे हैं। भ्रष्टाचार आज देश की व्यवस्था के नस-नस में समाया हुआ है। यानि सरकार को व्यवस्था का प्रक्षालन करने वाला मजबूत तंत्र विकसित और खड़ा करना होगा। बिना इसकी परवाह किये कि कौन सा तंत्र पहले से है और कौन सा नया। क्या लोकपाल को इसलिए खारिज किया जा सकेगा कि तुम तो अभी बच्चे हो, पहले चलना तो सीखो। जाहिर है इसका उत्तर होगा- नहीं।सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि आंदोलन में भीड़ इकट्ठा करना ही एकमात्र मकसद नहीं बने बल्कि यह ध्यान रखना ज्यादा जरूरी है कि उसमें कौन-कौन से लोग आ रहे हैं। एक-एक महत्वपूर्ण व्यक्ति के पीछे हजारों लाखों लोग खड़े हैं और इसलिए वैसे व्यक्तियों का आह्वान करना ज्यादा अहम हो सकता है। आंदोलनकारियों को भीड़ को देखकर प्रफुल्लित या हतोत्साहित होना अच्छी बात नहीं है। देशहित में भ्रष्टाचार की जड़ों पर प्रहार करने का वक्त आ गया है। भ्रष्टाचार की गंगोत्री बनी राजनीति को स्वच्छ और निर्मल करना अहम हो गया है। तमाम सवाल उठाए जाने चाहिएं। भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहनशीलता की बात उठाई जाती है। लेकिन राजनीतिक पार्टियां खुद ही पारदर्शिता कायम रखने और भ्रष्टाचार के आरोपों में शामिल लोगों को सिरे से नकारने से परहेज क्यों कर रही है? आखिर टीम अण्णा यह बात क्यों भूल रही है कि उत्तर प्रदेश हमेशा से देश में ‘किंगमेकर’ राज्य के तौर पर जाना जाता है। केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। और इसके साथ पंजाब, असम, मणिपुर और गोवा में भी तो विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। क्या दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों और देश के कुछ शहरों मात्र में आंदोलन को केंद्रित रखकर भ्रष्टाचार को मिटाये जाने का स्वप्न देखा जा रहा है? क्या सिर्फ कानून बना देने से किसी समस्या का हल संभव हुआ है? कानूनों के होते हुए भी देश, समाज में कई विसगतियां कायम रहती हैं जब तक कि उनके खिलाफ लोगों को सचेत-जागरूक नहीं किया जाता। वास्तव में आंदोलन को देश के जन-जन तक पहुंचाना होगा। हरेक गांव और शहर में आंदोलन खड़ा करने का लक्ष्य लेकर चलना होगा, तभी अभीष्ट की यथेष्ट प्राप्ति संभव है। इस बात को गांठ बांधकर चलना होगा कि ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही मकसद नहीं, ये सूरत बदलनी चाहिए।’
Saturday, January 7, 2012
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