अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल विधेयक की लड़ाई के लिए गठित टीम अण्णा कोर कमेटी को भंग करने का ऐलान करके राजनीतिक विकल्प देने के अपने संकल्प की ओर कदम बढ़ा दिया है। माना जा रहा है कि इसके बाद किसी राजनीतिक दल के गठन का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि टीम अण्णा के कुछ सदस्यों ने इस पर आश्चर्य व्यक्त किया है और यही वजह रही कि मीडिया में टीम अण्णा भंग होने के कारणों में अण्णा हजारे की नाराजगी को भी वजह माना जाने लगा। दूसरी ओर टीम अण्णा भंग होने के साथ ही अब भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल के मुद्दे हों या कोई और मुद्दा अब न तो इनलोगों की ओर से सरकार के साथ किसी तरह की बातचीत या अनशन आदि की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। जंतर-मंतर पर अनशन खत्म करते समय ही इस योजना की घोषणा कर दी गई थी कि 2014 लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए एक राजनीतिक विकल्प तैयार किया जाएगा। अण्णा हजारे ने ब्लॉग के जरिये टीम भंग करने का ऐलान किया है लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया है कि क्या वह फौरन किसी दल के गठन की घोषणा करेंगे। हालांकि राजनीतिक विकल्प तैयार करने की प्रक्रिया की चर्चा की है। उनका यह भी आरोप है कि सरकार जन लोकपाल विधेयक बनाने को तैयार नहीं है। ऐसे में कितने समय तक और कितनी बार हम अनशन करेंगे? असल में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रति सरकार की संवेदनहीनता के चलते मामला इस कदर बिगड़ गया था कि वहां से वापस लौटना आसान नहीं था। शायद यही वजह रही कि टीम अण्णा ने देश के कुछ प्रख्यात बुद्धिजीवियों की अपील और उसको ज्यादातर आंदोलनकारियों और आम लोगों के समर्थन को आधार बनाकर देश को राजनीतिक विकल्प मुहैया कराने का तरीका अपनाने की घोषणा के साथ आंदोलन का समापन किया। एक तरह से मुंबई में अनशन के दौरान कम भीड़ जुटने से जिस तरह की हताशा हुई थी उसे दिल्ली में आंदोलन के प्रति सरकारी हठधर्मिता ने और बढ़ा दिया। सरकार के मंत्री और कई राजनीतिक दलों के नेता तो शुरू से आंदोलन का मजाक उड़ाकर जनसंवेदना पर चोट करते ही रहे लेकिन इस बार के आंदोलन के प्रति पूरी राजनीतिक बिरादरी ने जिस तरह का रवैया अख्तियार कर लिया था, लोकतंत्र में उसकी काट तैयार करना बेहद जरूरी हो गया है। पिछले साल अपै्रल से ही टीम अण्णा हजारे के साथ सड़कों पर उतर आई थी। हजारे ने चार बार अनिश्चितकालीन और चार बार एक-एक दिन का अनशन किया था। लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने वाली संयुक्त समिति में अण्णा हजारे समेत शांति भूषण, अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी और प्रशांत भूषण शामिल हुए थे। अण्णा ने कहा कि मैंने पार्टी बनाने वाले लोगों से यह बात कह दी है। पार्टी बनने के बाद भी यह आंदोलन चलते रहना चाहिए। आंदोलन में, हमने पहले जन लोकपाल की मांग की थी और अब इस आंदोलन को जीवित रखने के लिए लोगों की मदद से अच्छे व्यक्तियों को संसद में भेजा जाना चाहिए, ताकि कानून बनाना सुनिश्चित किया जा सके। जनप्रतिनिधि अपने को सर्वोच्च मानने की भारी भूल कर रहे हैं और उनका यह अहम अब जनता की अदालत में फैसले के लिए जाने वाला है। भ्रष्टाचार को लेकर संदिग्ध रवैये के चलते हुई हार के बाद भी हमारे देश के राजनीतिक दल यह मानने को तैयार नहीं होते हैं कि उनकी हार के पीछे वजह भ्रष्टाचारियों को संरक्षण प्रदान करने की गलत नीति रही है। और यही हमारी राजनीतिक बिरादरी का सबसे बड़ा अवगुण माना जाता है।
Tuesday, August 14, 2012
टीम अण्णा भंग करके अब राजनीति की तैयारी शुरू
अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल विधेयक की लड़ाई के लिए गठित टीम अण्णा कोर कमेटी को भंग करने का ऐलान करके राजनीतिक विकल्प देने के अपने संकल्प की ओर कदम बढ़ा दिया है। माना जा रहा है कि इसके बाद किसी राजनीतिक दल के गठन का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि टीम अण्णा के कुछ सदस्यों ने इस पर आश्चर्य व्यक्त किया है और यही वजह रही कि मीडिया में टीम अण्णा भंग होने के कारणों में अण्णा हजारे की नाराजगी को भी वजह माना जाने लगा। दूसरी ओर टीम अण्णा भंग होने के साथ ही अब भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल के मुद्दे हों या कोई और मुद्दा अब न तो इनलोगों की ओर से सरकार के साथ किसी तरह की बातचीत या अनशन आदि की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। जंतर-मंतर पर अनशन खत्म करते समय ही इस योजना की घोषणा कर दी गई थी कि 2014 लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए एक राजनीतिक विकल्प तैयार किया जाएगा। अण्णा हजारे ने ब्लॉग के जरिये टीम भंग करने का ऐलान किया है लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया है कि क्या वह फौरन किसी दल के गठन की घोषणा करेंगे। हालांकि राजनीतिक विकल्प तैयार करने की प्रक्रिया की चर्चा की है। उनका यह भी आरोप है कि सरकार जन लोकपाल विधेयक बनाने को तैयार नहीं है। ऐसे में कितने समय तक और कितनी बार हम अनशन करेंगे? असल में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रति सरकार की संवेदनहीनता के चलते मामला इस कदर बिगड़ गया था कि वहां से वापस लौटना आसान नहीं था। शायद यही वजह रही कि टीम अण्णा ने देश के कुछ प्रख्यात बुद्धिजीवियों की अपील और उसको ज्यादातर आंदोलनकारियों और आम लोगों के समर्थन को आधार बनाकर देश को राजनीतिक विकल्प मुहैया कराने का तरीका अपनाने की घोषणा के साथ आंदोलन का समापन किया। एक तरह से मुंबई में अनशन के दौरान कम भीड़ जुटने से जिस तरह की हताशा हुई थी उसे दिल्ली में आंदोलन के प्रति सरकारी हठधर्मिता ने और बढ़ा दिया। सरकार के मंत्री और कई राजनीतिक दलों के नेता तो शुरू से आंदोलन का मजाक उड़ाकर जनसंवेदना पर चोट करते ही रहे लेकिन इस बार के आंदोलन के प्रति पूरी राजनीतिक बिरादरी ने जिस तरह का रवैया अख्तियार कर लिया था, लोकतंत्र में उसकी काट तैयार करना बेहद जरूरी हो गया है। पिछले साल अपै्रल से ही टीम अण्णा हजारे के साथ सड़कों पर उतर आई थी। हजारे ने चार बार अनिश्चितकालीन और चार बार एक-एक दिन का अनशन किया था। लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने वाली संयुक्त समिति में अण्णा हजारे समेत शांति भूषण, अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी और प्रशांत भूषण शामिल हुए थे। अण्णा ने कहा कि मैंने पार्टी बनाने वाले लोगों से यह बात कह दी है। पार्टी बनने के बाद भी यह आंदोलन चलते रहना चाहिए। आंदोलन में, हमने पहले जन लोकपाल की मांग की थी और अब इस आंदोलन को जीवित रखने के लिए लोगों की मदद से अच्छे व्यक्तियों को संसद में भेजा जाना चाहिए, ताकि कानून बनाना सुनिश्चित किया जा सके। जनप्रतिनिधि अपने को सर्वोच्च मानने की भारी भूल कर रहे हैं और उनका यह अहम अब जनता की अदालत में फैसले के लिए जाने वाला है। भ्रष्टाचार को लेकर संदिग्ध रवैये के चलते हुई हार के बाद भी हमारे देश के राजनीतिक दल यह मानने को तैयार नहीं होते हैं कि उनकी हार के पीछे वजह भ्रष्टाचारियों को संरक्षण प्रदान करने की गलत नीति रही है। और यही हमारी राजनीतिक बिरादरी का सबसे बड़ा अवगुण माना जाता है।
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